के नैना तरस गए

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कभी तो नजर आओ हमे
के नैना तरस गए
कभी तो खिलने दो बहारे
के बादल बरस गए

जो तुम्हे देखू तो मिलता सुकून
जो तुम देखो मेरी तरफ तो कही और न देखू
पर कभी तो नजरे मिलाओ नजरोँ से
के नैना तरस गए

जो तुम बात करो हमसे
हम बातोँ मे खो जाए
जो सोचू जब भी तुम्हारे बारे मे
हम रातो मे भी न सो पाए
पर कभी तो कोई ख्वाब सजने दो
के नैना तरस गए

जो कभी तुम हमारे पास आओ
हम सारी दुनिया भूल जाए
जो कभी तुम हात मिलाओ हमसे
हमे सारी खुशियाँ मिल जाए
पर कभी तो कदम रखो इस राह पर
के नैना तरस गए

जो कभी तुम करो आँखोँ से इशारा
हम वही इजहार-ए-मोहब्बत कर जाए
जो तुम कर दो ‘हाँ’ हमसे
हम खुशी के मारे मर जाए
पर कभी तो आँखोँ से कोई इशारा होने दो
के नैना तरस गए

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प्रतिक अक्कावार

नमस्कार. ह्या क्षणाला माझ्याकडे स्वतःबद्दल सांगण्यासारखे विशेष असे काही नाही. काहीतरी लिहावे असे नेहमीच वाटायचे म्हणून त्यादृष्टीने टाकलेले हे एक छोटेसे पाऊल.फक्त एक आवड म्हणून लिखाण सुरु करत आहे. शब्दांचा हा प्रवास जरा लांबचाच असणार आहे यात शंका नाही पण तुम्हाला माझे लिखाण आवडेल अशी आशा आहे. चला तर मग लवकरच भेटूया, तोपर्यंत काळजी घ्या. भेट दिल्याबद्दल धन्यवाद!

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